Saturday, 14 June 2014

आखिर ऐ क्यूँ है....?

जब नहीं तुझको यक़ीं अपना समझता क्यूँ है ?
रिश्ता रखता है तो फिर रोज़ परखता क्यूँ है ?

हमसफ़र छूट गए मैं जो तेरे साथ चला
वक़्त! तू साथ मेरे चाल ये चलता क्यूँ है ?

मैंने माना कि नहीं प्यार तो फिर इतना बता
कुछ नहीं दिल में तो आँखों से छलकता क्यूँ है ?

कह तो दी बात तेरे दिल की तेरी आँखों ने
मुँह से कहने की निभा रस्म तू डरता क्यूँ है ?

दाग़-ए-दिल जिसने दिया ज़िक्र जब आए उसका
दिल के कोने में कहीं दीप- सा जलता क्यूँ है ?

रख के पलकों पे तू नज़रों से गिरा देता है
मैं वही हूँ तेरा अन्दाज़ बदलता क्यूँ है ?

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