Monday, 27 August 2018

.  *फिर घमंड कैसा*
 
एक माचिस की तीली,
एक घी का लोटा,
लकड़ियों के ढेर पे,
कुछ घण्टे में राख़...
बस इतनी सी है -
      *आदमी की औक़ात !!*

एक बूढ़ा बाप शाम को मर गया,
अपनी सारी ज़िन्दगी,
परिवार के नाम कर गया,
कहीं रोने की सुगबुगाहट,
तो कहीं फुसफुसाहट...
अरे जल्दी ले जाओ
कौन रखेगा सारी रात...
बस इतनी सी है -
       *आदमी की औक़ात !!*

मरने के बाद नीचे देखा ,
नज़ारे नज़र आ रहे थे,
मेरी मौत पे .....
कुछ लोग ज़बरदस्त,
तो कुछ ज़बरदस्ती
रो रहे थे।
नहीं रहा...चला गया...
चार दिन करेंगे बात...
बस इतनी सी है -
       *आदमी की औक़ात !!*

बेटा अच्छी तस्वीर बनवायेगा,
सामने अगरबत्ती जलायेगा,
ख़ुश्बुदार फूलों की माला होगी...
अख़बार में अश्रुपूरित श्रृद्धांजली होगी...
बाद में उस तस्वीर पे,
जाले भी कौन करेगा साफ़...
बस इतनी सी है -
       *आदमी की औक़ात !!*

ज़िन्दगी भर,
मेरा-मेरा-मेरा किया...
अपने लिए कम,
अपनों के लिए ज़्यादा जिया...
कोई न देगा साथ...
जायेगा ख़ाली हाथ...
क्या तिनका ले जाने की भी है  औक़ात ???
फिर घमंड कैसा ?
*बस इतनी सी है - आदमी की औक़ात !!*

Friday, 24 August 2018


*तेरी किताब के हर्फ़े, समझ नहीं आते।*
*ऐ ज़िन्दगी तेरे फ़लसफ़े, समझ नहीं आते।।*
*कितने पन्नें हैं, किसको संभाल कर रखूँ।*
*और कौन से फाड़ दूँ सफ़हे, समझ नहीं आते।।*
*चौंकाया है ज़िन्दगी, यूँ हर मोड़ पर तुमने।*
*बाक़ी कितने हैं शगूफे, समझ नहीं आते।।*
*हम तो ग़म में भी, ठहाके लगाया करते थे।*
*अब आलम ये है, कि.. लतीफे समझ नहीं आते।।*
*तेरा शुकराना, जो हर नेमत से नवाज़ा मुझको।*
*पर जाने क्यों अब तेरे तोहफ़े, समझ नहीं आते।।*
                 *- करण शादीजा*

Saturday, 28 July 2018

जाने क्यूँ,
अब शर्म से,
चेहरे गुलाब नहीं होते।
जाने क्यूँ,
अब मस्त मौला मिजाज नहीं होते।

पहले बता दिया करते थे,
दिल की बातें।
जाने क्यूँ,
अब चेहरे,
खुली किताब नहीं होते।

सुना है,
बिन कहे,
दिल की बात,
समझ लेते थे।
गले लगते ही,
दोस्त हालात,
समझ लेते थे।

तब ना फेस बुक था,
ना स्मार्ट फ़ोन,
ना ट्विटर अकाउंट,
एक चिट्टी से ही,
दिलों के जज्बात,
समझ लेते थे।

सोचता हूँ,
हम कहाँ से कहाँ आगए,
व्यावहारिकता सोचते सोचते,
भावनाओं को खा गये।

अब भाई भाई से,
समस्या का समाधान,
कहाँ पूछता है,
अब बेटा बाप से,
उलझनों का निदान,
कहाँ पूछता है,
बेटी नहीं पूछती,
माँ से गृहस्थी के सलीके,
अब कौन गुरु के,
चरणों में बैठकर,
ज्ञान की परिभाषा सीखता है।

परियों की बातें,
अब किसे भाती है,
अपनों की याद,
अब किसे रुलाती है,
अब कौन,
गरीब को सखा बताता है,
अब कहाँ,
कृष्ण सुदामा को गले लगाता है

जिन्दगी में,
हम केवल व्यावहारिक हो गये हैं,
मशीन बन गए हैं हम सब,
इंसान जाने कहाँ खो गये हैं!

इंसान जाने कहां खो गये हैं...