*तेरी किताब के हर्फ़े, समझ नहीं आते।*
*ऐ ज़िन्दगी तेरे फ़लसफ़े, समझ नहीं आते।।*
*ऐ ज़िन्दगी तेरे फ़लसफ़े, समझ नहीं आते।।*
*कितने पन्नें हैं, किसको संभाल कर रखूँ।*
*और कौन से फाड़ दूँ सफ़हे, समझ नहीं आते।।*
*और कौन से फाड़ दूँ सफ़हे, समझ नहीं आते।।*
*चौंकाया है ज़िन्दगी, यूँ हर मोड़ पर तुमने।*
*बाक़ी कितने हैं शगूफे, समझ नहीं आते।।*
*बाक़ी कितने हैं शगूफे, समझ नहीं आते।।*
*हम तो ग़म में भी, ठहाके लगाया करते थे।*
*अब आलम ये है, कि.. लतीफे समझ नहीं आते।।*
*अब आलम ये है, कि.. लतीफे समझ नहीं आते।।*
*तेरा शुकराना, जो हर नेमत से नवाज़ा मुझको।*
*पर जाने क्यों अब तेरे तोहफ़े, समझ नहीं आते।।*
*- करण शादीजा*
*पर जाने क्यों अब तेरे तोहफ़े, समझ नहीं आते।।*
*- करण शादीजा*
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