Sunday, 4 August 2024

क्या ही लिखी। कुछ तो लिखूं

 मैं तो तुमसे दूर रहा अपने मन की कहने तक,

और तुम मुझसे दूर रही अपने मन की सुनने तक 

क्लासरूम के बाहर उस दिन जब तुम निपट अकेले में 

अनायास यूँ टकराई थी केमिस्ट्री का पेपर ही था

पास तुम्हारे हाथों में,

अर्थशास्त्र का अंतिम पर्चा

मैं लिख आया शायद


तब मुझको कह देना था,

कैसा हुआ है पेपर ?

मुस्कुरा के तुम कह देती "अच्छा"

 ...और कितना अच्छा होता । 

जैसे "मांग का नियम"

निर्धारित कर देता, मेरा भी एक मूल्य

या फिर कोई समीकरण ही हल हो जाता ।

No comments:

Post a Comment